सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लर्निंग आउटकम एवं आकलन

आप भली भांति अवगत हैं कि विद्यालयीय पाठ्यक्रम का निर्धारण एवं पाठ्यपुस्तकों/ कार्यपुस्तिकाओं का निर्माण विभिन्न कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए निर्धारित दक्षताओं के विकास क ध्यान में रखकर किया गया है।

 शिक्षक पाठ्यपुस्तकों/कार्यपुस्तिका व अन्य शिक्षण सहायक सामग्र के माध्यम से अपनी कक्षा-शिक्षण गतिविधियों को संचालित करते हैं।

 वास्तव में कक्षा शिक्षण के उपरान्त सबसे महत्वपूर्ण एवं व्यावहारिक पक्ष यह है कि क्या बच्चे उन दक्षताओं को प्राप्त कर रहे हैं अथवा नहीं।


लर्निंग आउटकम (अधिगम सम्बन्धी परिणाम):

लर्निंग आउटकम इसी बात पर बल देते हैं कि मात्र शिक्षक ही नहीं अपितु अभिभावक भी य जानें कि उनका बच्चा जिस कक्षा में है, उस कक्षा के विभिन्न विषयों में उसे क्या-क्या ज्ञान होन चाहिए और क्या-क्या ज्ञान उसने अर्जित कर लिया है।






'लर्निंग आउटकम (अधिगम सम्बन्धी परिणाम ) से आशय उन परिणामों (दक्षताओं) से है जो किसी कक्षा में अध्ययनरत विद्यार्थियों को उनके निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप अपेक्षित दक्षताओं के प्राप्त होने पर परिलक्षित होते हैं।


यह एक 'परिणाम आधारित लक्ष्य है' जो कि बच्चे की प्रगति का आकलन गुणात्मक तथा संख्यात्मक रूप से करने हेतु अवलोकन बिन्दु प्रदान करता है।


लर्निंग आउटकम की अवधारणा को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर और स्पष्टता से समझा जा सकता है-

लर्निंग आउटकम बच्चों को प्राप्त दक्षता का मूल्यांकन करने और शिक्षकों को आगामी शिक्षण संबंधी दिशा प्रदान करने पर बल देते हैं।


परिणाम आधारित लर्निंग आउटकम प्राप्त करने के लिए शिक्षक अपने सोच, ज्ञान व अनुभव के आधार पर शिक्षण विधियों, नवाचारों एवं आई.सी.टी. का प्रयोग करने के लिए स्वतन्त्र होते हैं।


यह बच्चों को जानने, समझने एवं पुस्तकीय ज्ञान का व्यवहार में उपयोग करने के लिए बच्चों में तर्क, चिन्तन एवं कल्पना शक्ति के विकास पर बल देते हैं।

 आइए, हम लर्निंग आउटकम को कुछ उदाहरणों के माध्यम से समझते हैं। नीचे कक्षा 1 हिन्दी विषय के कुछ मूलभूत लर्निंग आउटकम दिए गए हैं


बच्चे परिवेशीय ध्वनियों, बोलियों, वाहन, घण्टी आदि की ध्वनियों को पहचानते हैं।


बच्चे प्रथम एवं अंतिम ध्वनि वाले शब्दों को पहचानते हैं, जैसे- पग, पर, पल, जग, पग/ हल, चल आदि।


बच्चे वर्ण/अक्षर की आकृति को पहचानते हैं। बच्चे वर्णों को जोड़कर अमात्रिक शब्द बनाते एवं पढ़ते हैं, जैसे- जल, हल, नल, चल, मगर, डगर आदि।


बच्चे वर्णों एवं अमात्रिक शब्दों को उनकी सही बनावट में लिखते हैं। इसी प्रकार सभी विषयों की पाठ्यपुस्तकों में लर्निंग आउटकम निर्धारित किए गए हैं।

 अब हम लर्निंग आउटकम के व्यावहारिक पक्ष को एक उदाहरण से समझते हैं। कक्षा 3 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को गणित की कक्षा में जोड़-घटाना पर आधारित इबारती प्रश्नों को हल करना सिखाया गया। 

इसी कक्षा का एक छात्र राहुल बाजार से सामान लाने के लिए जाता है। यदि वह सामान लेकर बचे हुए रूपयों का हिसाब सही-सही रख रहा है, तो इसका आश यह निकलता है कि राहुल जोड़-घटाव की क्रिया का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर चुका है और यू ज्ञान उसके दैनिक जीवन में 'सीखने के प्रतिफल' के रूप में परिलक्षित हो रहा है।


इस प्रकार लर्निंग आउटकम हमें स्पष्ट रूप से यह बताता है कि बच्चे ने कौन-कौन दक्षता हासिल कर ली हैं।


अधिगम स्तर में अंतर:(learning gap)


अभी तक हमने लर्निंग आउटकम एवं इसकी आवश्यकता क्यों है, इस पर समझ बनार हमने यह जाना है कि लर्निंग आउटकम बच्चों की वास्तविक सीख के बारे में स्पष्ट सूचना देता किसी भी शिक्षक के लिए यह जानना बहुत आवश्यक है कि उसकी कक्षा में बच्चों की वास्तवि स्थिति क्या है।

एक परिस्थिति पर विचार करते हैं। आप उच्च प्राथमिक विद्यालय में गणित के शिक्षक तथा कक्षा 8 के बच्चों को पढ़ाते हैं। 

क्या आप सोचते हैं कि कक्षा 8 में प्रवेश लेने वाले सभी बच ने कक्षा 7 तक की गणित की मूलभूत दक्षताओं को प्राप्त कर लिया इसी प्रकार यदि आप हिन्दी अंग्रेजी या विज्ञान के शिक्षक हैं, तो क्या आप कह सकते हैं कि सभी बच्चों ने कक्षा 7 तक संबंधित विषयों की मूलभूत दक्षताओं प्राप्त कर ली हैं? ज्यादातर शिक्षकों का उत्तर 'ना' में होगा।

 इस संबंध में सरकारी विद्यालयों में किए अध्ययन भी यह बताते हैं कि बच्चों का वास्तविक अधिगम स्तर तथा कक्षानुरूप अपे अधिगम स्तर में अंतर (गैप) होता है।

ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे?


क्या आप इस स्थिति को नजरअंदाज करते हुए सामान्य शिक्षण करते रहेंगे? क्या पाठ्यक्रम को पूरा करना ही आपका उद्देश्य होगा?


या फिर आप ऐसी स्थिति में अधिगम स्तर के अंतर को कम करने का प्रयास करेंगे।


सीखने के स्तर का आकलन:


आप बच्चों की प्रगति का आकलन कैसे करते हैं? सामान्यतः उत्तर होगा- संत्र परी अर्द्धवार्षिक परीक्षा या वार्षिक परीक्षा के माध्यम से । यदि किसी परीक्षा में एक बच्चा किसी विष 50 में 40 अंक प्राप्त करता है, तो क्या आप बता सकते हैं कि उसे क्या नहीं आ रहा है? 

क्या प्राप्त को देखकर आप बता सकते हैं कि बच्चे ने क्या-क्या सीख लिया है? या बच्चे ने उस विषय कक्षा अनुरूप किन-किन मूलभूत दक्षताओं को प्राप्त कर लिया है?

अंक आधारित मूल्यांकन हमें बच्चों की वास्तविक सीख स्तर को नहीं बता पाता है।

 यह इतना बताता है कि बच्चे ने 70 प्रतिशत या 80 प्रतिशत अंक प्राप्त किए और इससे माना जा सकता है कि बच्चे ने लगभग इतने प्रतिशत पाठ्यक्रम को समझा भी है।

 कोई शिक्षक यदि जिज्ञासु है तो उत्तरपुस्तिका को देखकर वह यह जान सकता है कि बच्चे ने किन-किन बिन्दुओं को समझ लिया है। इससे आगे इस प्रकार के मूल्यांकन का और कोई उपयोग नहीं होता है। इस चर्चा से यह स्पष्ट है कि इस प्रकार का मूल्यांकन बच्चों के अधिगम स्तर के अंतर को समझने तथा इसे कम करने में मददगार नहीं है। अब आप निश्चित रूप से यह सोच रहे होंगे कि वास्तविक अधिगम स्तर तथा अपेक्षित

अधिगम स्तर के मध्य अंतर को आखिर कैसे पता करें? इसके बाद एक प्रश्न और भी है- अधिगम स्थिति में अंतर को ज्ञात करने के पश्चात एक शिक्षक होने के नाते आप क्या करेंगे? अधिकांश शिक्षकों के लिए परेशानी यह है कि अधिगम स्तर में अंतर की स्थिति में बच्चे तापमान कक्षा के पाठ्यक्रम को कैसे पूरा कर पायेंगे।

अधिकांश शिक्षकों के लिए परेशानी यह है कि अधिगम स्तर में अंतर की स्थिति में बच्चे वर्तमान कक्षा के पाठ्यक्रम को कैसे पूरा कर पायेंगे। उदाहरण के लिए, यदि बच्चा वर्ण पहचान नहीं कर पा रहा है तो वह पाठ कैसे पढ़ेगा, उसे कैसे समझेगा? उसी प्रकार यदि बच्चा एक या दो अंकों का जोड़ नहीं कर पा रहा है तो वह हासिल का जोड़, या फिर गुणा-भाग और बीजगणित के सवालों को कैसे हल करेगा? 

आपने यह भी अनुभव किया होगा कि कुछ विद्यार्थी भाग के प्रश्न करने में कठिनाई का अनुभव करते हैं यद्यपि उन्हें गुणा करना अच्छी तरह से आता है। ये परिस्थितियाँ एक लिए काफी कठिनाई पैदा करती हैं।




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गणित सीखने-सिखाने का सही क्रम क्या होना चाहिए?

बच्चों के पास स्कूल आने से पहले गणित से सम्बन्धित अनेक अनुभव पास होते हैं बच्चों के तमाम खेल ऐसे जिनमें वे सैंकड़े से लेकर हजार तक का हिसाब रखते हैं। वे अपने खेलों में चीजों का बराबर बँटवारा कर लेते हैं।  अपनी चीजों का हिसाब रखते हैं। छोटा-बड़ा, कम-ज्यादा, आगे-पीछे, उपर-नीचे, समूह बनाना, तुलना करना, गणना करना, मुद्रा की पहचान, दूरी का अनुमान, घटना-बढ़ना जैसी तमाम अवधारणाओं से बच्चे परिचित होते हैं।  हम बच्चों को प्रतीक ही सिखाते हैं। उनके अनुभवों को प्रतीकों से जोड़ना महत्वपूर्ण है। गणित मूर्त और अमूर्त से जुड़ने और जूझने का प्रयास है अवधारणाएँ अमूर्त होती हैं चाहे विषय कोई भी हो।  गणितीय अमूर्तता को मूर्त, ठोस चीजों की मदद से सरल बनाया जा सकता है। जब मूर्त को अमूर्त से जोड़ा जाता है तो अमूर्त का अर्थ स्पष्ट हो जाता है।  प्रस्तुतीकरण के तरीकों से भी कई बार गणित अमूर्त प्रतीत होने लगता है। शुरुआती दिनों में गणित सीखने में ठोस वस्तुओं की भूमिका अहम होती है इस उम्र में बच्चे स्वाभाविक तौर पर तरह-तरह की चीजों से खेलते हैं, उन्हें जमाते. बिगाड़ते और फिर से जमाते हैं।  इस प्रक्रिया में उनकी

समावेशी शिक्षा क्या है? समावेशी शिक्षा की विशेषताएं एवं रिपोटिंग/डाक्युमेन्टेशन

कक्षा में बच्चों के साथ कार्य करते हुए आपने अनुभव किया होगा कि हर बच्चा स्वयं में कोई न कोई विशिष्टता एवं विविधता लिए होता है । उनके रुचि और रुझानों में भी यह विविधता पाई जाती है।  यह विविधता काफी हद तक उनके परिवेश एवं परिस्थितियों के कारण या शारीरिक आकार प्रकार से प्रभावित होती है। बच्चों में इस विविधता के कारण कुछ खास श्रेणियाँ उभरकर आती हैं। जैसे- तेज/धीमी गति से सीखने वाले, शारीरिक कारणों से सीखने में बाधा अनुभव करने वाले बच्चे, परिवेशीय व लैंगिक विविधता वाले बच्चे।  इनमें कुछ और श्रेणियाँ भी जुड़ सकती हैं। शिक्षक के रूप में इतनी विविधता से भरे बच्चों को हमें कक्षा के भीतर सीखने का समावेशी वातावरण देना होता है। समावेशी शिक्षा अर्थात् ऐसी शिक्षा जो सबके लिए हो। विद्यालय में विविधताओं से भरे सभी प्रकार के बच्चों को एक साथ एक कक्षा में शिक्षा देना ही समावेशी शिक्षा है। समावेशी शिक्षा से तात्पर्य है वह शिक्षा जिसमें किसी एक विशेष व्यक्ति श्रेणी पर निर्भर न होकर सभी को शामिल किया जाता है । "समावेशन शब्द का अपने-आप में कुछ खास अर्थ नहीं होता है। समावेशन के चारों ओर जो वैचारिक, दार्

शिक्षण संग्रह (Compendium) : शिक्षण संग्रह की अवधारणा एवं आवश्यकता - ( Concept and Need)

यह सर्वविदित है कि प्राथमिक विद्यालय के वातावरण का प्रभाव बच्चों (विद्यार्थियों) के सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता है। प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षक/शिक्षिका अपने कार्य एवं आचरण के माध्यम से विद्यार्थियों में अनेक अच्छी आदतों जैसे- अनुशासित रहना, विद्यालय के नियमों का पालन करना, शिक्षकों का आदर-सम्मान करना, आपस में एक दूसरे का सहयोग करना आदि को सहज रूप में अंतरित द विकसित करते रहते हैं यही गुण कालांतर में बच्चों के व्यक्तित्व एवं सामाजिक जीवन में संस्कारों के रूप में परिलक्षित होते हैं। बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में विद्यालय के शैक्षिक वातावरण की इस महत्त्वपूर्ण भूमिका के सन्दर्भ में अगर हम विचार करते हैं तो प्रमुख रूप से निम्नांकित अवयव उभर कर आते हैं विद्यालय भवन का अत्यंत आकर्षक और साफ सुथरा होना। विद्यालय भवन की बाउण्ड्री वॉल का राष्ट्रीय प्रतीकों, रोचक खेलों, पशु-पक्षियों के रंगीन चित्रों से सुसज्जित होना। विद्यालय भवन की दीवारों, खम्भों फर्श, बरामदों को महापुरुषों के चित्रों, आदर्श वाक्यों/सूक्तियों, वर्णमाला आदि से सुसज्जित होना। कक्षा-कक्षों में समय सारिणी, शैक्षिक चार्ट्स मॉडल्स, लर्