ध्यानाकर्षण (अधिगम आधारित शिक्षण) की आवश्कता एवं उद्देश्य

किसी भी कक्षा में कुछ बच्चे अपनी कक्षा एवं आयु के अनुसार
अधिगम सम्प्राप्ति स्तर अर्थात् परीक्षाओं तुलनात्मक रूप से कम अंक प्राप्त कर पाते हैं तथा उनका परीक्षा परिणाम भी सामान्य  बच्चों की तुलना में संतोषजनक नहीं होता है।


 प्रायः देखा गया है कि शिक्षक द्वारा विभिन्न शैक्षणिक प्रयासों के बावजूद बच्चों में भाषा कौशलों को ग्रहण करने में कठिनाई होती रही है।

 उदाहरणस्वरूप लिखने में वर्तनी की अशुद्धियाँ, वर्णों-शब्दों को पहचानने में कठिनाई तथा उच्चारण में काफी अशुद्धियाँ देखी गई हैं। इसके अलावा बच्चों में भाषा ज्ञान के बावजूद बोलने व बातचीत में झिझक महसूस करने जैसी समस्याएँ देखी ग हैं।

 इसी प्रकार गणित विषय में अंकों व चिह्नों की पहचान, संख्याओं के आरोही व अवरोही क्रम को समझने, जोड़, घटाना, गुणा व भाग तथा अधूरी गिनती को पूरा करना जैसी गणितीय क्रियाओं में या तो वे अशुद्धियाँ करते हैं या समझ नहीं पाते हैं।

 यही हाल लगभग अन्य विषयों में भी होता है।

क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे शैक्षिक तौर पिछड़ रहे बच्चे हमारे विद्यालयों से निराश न हो और उनमें पुनः आत्मविश्वास की जागृति हो और वे भी परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकें? उत्तर है हाँ। 

शिक्षक द्वारा इन बच्चों पर कुछ खास तकनीकों द्वारा ध्यानाकर्षण करने से यह संभव है।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में ध्यानाकर्षण तकनीकियों को अंगीकृत (अपनाया) करके शत-प्रतिशत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।


ध्यानाकर्षण शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य -


"उन बच्चों की मदद करना है जिन्हें कक्षा शिक्षण के दौरान अपनी कक्षा के स्तर के अनुरूप अवध शालाओं एवं कौशलों को सीखने में कठिनाई/परेशानी होती है,जिसके परिणामस्वरूप वे परीक्षाओं में तुलनात्मक रूप से अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं। बच्चों द्वारा कक्षानुरूप अधिगम स्तर प्राप्त न कर पाने के कई कारण होते हैं, जैसे- पारिवारिक शैक्षिक स्थिति व वातावरण, आर्थिक स्थिति, शारीरिक या


मानसिक रूप से विशेष स्थिति, बच्चों के अनुरूप शिक्षण न होना, अध्यापकों का व्यवहार आदि । इनमें एक प्रमुख कारण है अध्यापकों का कठोर व्यवहार (Rigid Behaviour of Teacher ) व


बाल केन्द्रित शिक्षण विधियों का प्रयोग न करना।


प्रायः देखा गया है कि बच्चे शिक्षक के कठोर व्यवहार के कारण कक्षा में हो रहे पठन-पाठन में रुचि नहीं ले पाते। वे डरे-सहमे रहते हैं। अध्यापकों के व्यवहार में बच्चों के प्रति सहानुभूति न होने के कारण बच्चे अपनी समस्याएँ एवं जिज्ञासाएँ व्यक्त नहीं कर पाते हैं। पाठ न समझने पर भी समझ लेने की बात कह देते हैं। शिक्षक की उदासीनता एवं उसके कठोर व्यवहार के कारण बच्चों 

को विषयगत लर्निग आउटकम प्राप्त नहीं हो पाते हैं। अध्यापकों के तिरस्कार पूर्ण पारिवारिक कलह, ज्ञानेन्द्रिय विचारों अभिभावकों की शैक्षिक परिस्थितियों इत्यादि कारणों फलस्वरूप बच्चे सीखने में पिछड़ जाते हैं उनकी शैक्षिक सम्प्राप्ति के स्तर में कमी परिलक्षित हो है। 


ऐसी स्थिति में शिक्षक अपने कक्षा-शिक्षण में बच्चों की शैक्षिक सम्प्राप्ति स्तर में कमी को करने तथा उन्हें कक्षानुरूप लाने के लिए निम्नांकित बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित कर अपनी योजना बना सकते हैं -

. पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों पर आधारित प्रत्येक कक्षा (कक्षा 3 से 8 तक) के सभी विषय (प्रमुखतः हिन्दी, गणित, विज्ञान व अंग्रेजी) से संबंधित लर्निग आउटकम (विषय आधारित दक्षताएँ) को लक्ष्य बनाकर शिक्षण कार्य करें।


पठन-पाठन के दौरान कक्षा के सभी विद्यार्थियों का सतत अवलोकन करते हुए उनके कठिनाइयों का आकलन करना आवश्यक होगा, तभी ऐसे सभी बच्चों पर ध्यानाकर्षण की संभावना प्रबल होगी।


भावनात्मक विकास के लिए ध्यानाकर्षण की शुरुआत सत्र के प्रारम्भ में ही बच्चों की कठिनाई स्तर के अनुसार योजन बना कर व आवश्यक तैयारी करके करनी होगी। साथ ही बच्चों की संप्राप्ति को समझने लिए आवश्यक आकलन उपकरणों की व्यवस्था भी करनी होगी।

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