विद्यालयी शिक्षा में नयी पहलें, अधिगम के उद्देश्य एवम विद्यालयी शिक्षा के लिए समेकित योजना

शिक्षा, मानव संसाधन विकास का मूल है जो देश की सामाजिक-आर्थिक बनावट को संतुलित करने में महत्वपूर्ण और सहायक भूमिका निभाती है बेहतर गुणवत्ता का जीवन प्राप्त करने के लिए एवं अच्छा नागरिक बनने के लिए बच्चों का चहुँमुखी विकास जरूरी है।


 शिक्षा की एक मजबूत नींव के निर्माण से इसे प्राप्त किया जा सकता है। इस मिशन के अनुसरण में, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एम.एच.आर.डी.) दो विभागों के माध्यम से काम करता है

 स्कूली शिक्षा और साक्षरता 

 उच्च शिक्षा विभाग

 जहाँ विद्यालय शिक्षा और साक्षरता विभाग देश में स्कूली शिक्षा के विकास के लिए जिम्मेदार है, वहीं उच्च शिक्षा विभाग, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा व्यवस्था में से एक की देखभाल करता है।

 एम.एच.आर.डी. अपने संगठनों जैसे एन.सी.ई.आर.टी, एन.आई.ई.पी.ए. एन.आई.ओ.एस., एन.सी.टी.ई. आदि के साथ मिलकर काम कर रहा है। हालाँकि एम.एच.आर.डी. का दायरा बहुत व्यापक है, यह मॉड्यूल डी.ओ.एस.ई.एल. द्वारा सार्वभौमिक शिक्षा और इसकी गुणवत्ता में सुधार की दिशा में हाल में किए गए प्रयासों पर केंद्रित है।

अधिगम के उद्देश्य

इस मॉड्यूल के अध्ययन से शिक्षार्थी-

डी.ओ.एस.ई.एल. द्वारा स्कूली शिक्षा हेतु किए गए हाल के प्रयासों जैसे- पी. जी. आई., यू.डी.ई.एस.ई.+ आदि के बारे में जागरूकता प्राप्त कर स्कूल में क्रियान्वित कर पाएँगे।

विद्यालय शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए 'समग्र शिक्षा के अंतर्गत उद्देश्यों और प्रावधानों को समझेंगे।

स्कूलों में सीखने-पढ़ने की आदतों को बढ़ावा देने के संदर्भ में पुस्तकालय की पुस्तकों के उपयोग और खेल, रसोईघर से जुड़ी बागवानी (किचन गार्डन; पोषण उद्यान), युवा और पारिस्थितिकी क्लब आदि प्रयासों के माध्यम से बच्चों को आनंदमय एवं अनुभवजन्य अधिगम के अवसर प्रदान करेंगे।

भूमिका

1976 से पहले तक शिक्षा राज्यों की विशेष जिम्मेदारी थी। 1976 का संवैधानिक संशोधन, जिससे शिक्षा समवर्ती सूची में शामिल हुई, एक महत्वपूर्ण दूरगामी कदम था।

 वित्तीय, प्रशासनिक और मूलभूत बदलावों के लिए केंद्र सरकार और राज्यों के बीच ज़िम्मेदारी के नए बंटवारे की आवश्यकता थी।

 हालांकि इससे शिक्षा में राज्यों की भूमिका और जिम्मेदारी काफी हद तक अपरिवर्तित रही है, पर इसके बावजूद केंद्र सरकार ने शिक्षा के राष्ट्रीय और एकीकृत चरित्र को मजबूत करने, सभी स्तरों पर शिक्षा के पेशे सहित अन्य समस्त आयामों में गुणवत्ता और मानक बनाए रखने और देश की शैक्षिक ज़रूरतों के अध्ययन और निगरानी की एक बड़ी ज़िम्मेदारी स्वीकार की। 

देश में प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण (यू.ई.ई.) की प्राप्ति के साथ-साथ माध्यमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने कई कार्यक्रमों और परियोजनाओं की शुरुआत की, जिन्हें आम तौर पर केंद्र प्रायोजित योजना (सी.एस.एस.) कहा जाता है। 

सी.एस.एस. वे योजनाएँ हैं जो राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों (यू.टी.) की सरकारों द्वारा कार्यान्वित की जाती हैं, लेकिन इनका वित्तपोषण मुख्यतया केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है, जिसमें राज्य सरकार की भागीदारी भी निर्धारित होती है। शिक्षा पर राष्ट्रीय नीतियों के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए देश की मानव संसाधन क्षमता का पूरी तरह से उपयोग करने तथा समान गुणवत्ता की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार, विभिन्न केंद्र प्रायोजित योजनाओं के कार्यान्वयन में एकीकृत दृष्टिकोण अपनाती है।

 इसके सर्वमान्य उद्देश्य हैं— गुणवत्तापूर्ण विद्यालय शिक्षा के साथ-साथ पहुँच बढ़ाना; वंचित समूहों और कमजोर वर्गों के समावेश के माध्यम से साम्यता को बढ़ावा देना; और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना।

 हाल ही में एम.एच.आर.डी. ने प्रदर्शन ग्रेड इंडेक्स (पी.जी.आई), यू.डी.आई.एस.ई.+, विद्यालय ऑडिट (शगुनोत्सव) और राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (एन.ए.एस.) जैसे कई नये प्रयास किए हैं, ताकि समग्र शिक्षा के अंतर्गत अधिगम प्रतिफलों में सुधार हेतु, प्रशासनिक शासन के मुद्दों और शैक्षणिक कार्यक्रमो सहित, विद्यालयी शिक्षा की संपूर्ण गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके।

 इन पहलों की सफलता प्रभावी कार्यान्वयन, सभी स्तरों पर समन्वय और राष्ट्रीय स्तर से विद्यालय स्तर तक संस्थानों के बीच मज़बूत संबंध पर निर्भर करती है। 

समग्र शिक्षा- विद्यालयी शिक्षा के लिए समेकित योजना

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 2018-19 में समग्र शिक्षा का शुभारंभ किया। विद्यालयी शिक्षा के क्षेत्र में यह एक सर्वसमावेशी कार्यक्रम है, जिसका विस्तार विद्यालय-पूर्व से लेकर बारहवीं कक्षा तक है और इसका उद्देश्य है कि विद्यालयी शिक्षा की प्रभावशीलता, जिसे समरूप अधिगम प्रतिफलों एवं विद्यालय प्रवेश के समान अवसरों के रूप में मापा जाता है, का संवर्धन किया जा सके। 

इसमें सर्व शिक्षा अभियान (एस.एस.ए.), राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आर.एम.एस.ए.) और शिक्षक शिक्षा (टी.ई.) की तीन पूर्ववर्ती योजनाएं समाहित है। 

परियोजना उद्देश्यों से शिक्षा की गुणवत्ता और व्यवस्था स्तर पर प्रदर्शन में सुधार के लिए विद्यालयी परिणामों के आधार पर यह योजना राज्यों के उत्साहवर्धन जैसे बदलावों को चिह्नित करती है।

इस योजना में 'विद्यालय' की परिकल्पना विद्यालय-पूर्व, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक एक निरंतरता के रूप में की गयी है।

 योजना की दूरदृष्टि में शिक्षा के लिए सतत विकास लक्ष्य (एस.डी.जी.) के अनुसार विद्यालय-पूर्व से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक समावेशी और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित करना है। 

एस.डी.जी. लक्ष्य 4.1 में कहा गया है कि "सुनिश्चित करें कि 2030 तक सभी लड़के और लड़कियां, संगत एवं प्रभावी अधिगम प्रतिफलों की ओर ले जाने वाली निःशुल्क, न्यायसंगत एवं गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को पूरा करो" आगे एस.डी.जी. 4.5 में कहा गया है कि "2030 तक, शिक्षा में जेंडर संबंधी विकृतियों को खत्म करें तथा अति संवेदी (वल्नरेबल) लोगों, जिसमें विशेष आवश्यकता समूह और देशज समुदाय के लोगों के साथ ही संवेदनशील परिस्थितियों वाले बच्चे शामिल हैं, के लिए शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के सभी स्तरों तक समान पहुँच सुनिश्चित करें।"


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